Tuesday, December 14, 2021

लघुकथा 1 माँ

माँ की ममता 
★★★★★

एक बार एक शहरी परिवार मेले मेँ घूमने गया

मेले मेँ 1 घंटे तक घूमे कि अचानक उनका बेटा मेले में कहीं खो गया.

दोनो पति-पत्नी मेले में बहुत ढूढ़ते है लेकिन लङका नही मिलता है.

लङके कि माँ जोर-जोर से रोने लगती है बाद में पुलिस को सूचना देते है.

आधे घण्टे बाद लड़का मिल जाता है.

लड़के के मिलते ही उसका पति गाँव का टिकिट लेकर
आता है.

और वो सब बस में बैठकर गाँव रवाना हो जाते है.

तभी पत्नी ने पुछा: हम गाँव क्यों जा रहे है अपने घर नही जाना है क्या?

तभी उसका पति बोला:
"तू तेरी औलाद के बिना आधा घण्टा नही रह सकती
तो मेरी माँ गाँव में पिछलें 10 साल से मेरे बिना कैसे
जी रही होगी ?

माँ-बाप का दिल दु:खाकर आजतक कोई सुखी नही हुआ.

प्रस्तुति 
■■ साक्षी 

गुरुबक्षणी निवास स्ट्रीट 5 रविग्राम तेलीबांधा धर्मशाला के सामने रायपुर छग 492006
मोबाइल 8109224468

राज कपूर

राज कपूर 14 दिसंबर 1924 को एक शहर पेशावर (अब पाकिस्तान में) में पैदा हुआ थे. उनके पिता पृथ्वीराज कपूर एवं माता का नाम रामसरानी देवी कपूर था. उनके बचपन का नाम राज नहीं बल्कि रणबीर था इसी नाम से उनके पोते का नाम रखा गया.
  राज कपूर ने एक clap Boy और केदार शर्मा के असिस्टेंट के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। सन् 1935 में, ग्यारह वर्ष की आयु में राज कपूर अपनी पहली फिल्म इंकलाब में काम किया था.
राज कपूर को बड़ा ब्रेक 1947 में मिला जब उन्होंने केदार शर्मा द्वारा निर्देशित फिल्म नील कमल, में अग्रणी भूमिका निभाई।
1948 में, चौबीस साल की उम्र में राज कपूर ने अपने स्टूडियो आर के फिल्म्स की स्थापना की, और अपने समय के सबसे कम उम्र के फिल्म निर्देशक बन गए। एक निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म आग थी. फिल्म सफल थी।

इसके बाद राज कपूर ने कई फिल्मों का निर्देशन किया। उनमें से ज्यादातर में उन्होंने खुद अभिनय भी किया। राज कपूर द्वारा निर्देशित प्रसिद्ध फिल्मों में से कुछ बरसात (1949), आवारा (1951), श्री 420 (1955), और संगम (1964) हैं। उन्होंने नरगिस के साथ एक हिट जोड़ी का गठन किया।
राज कपूर अपनी फिल्मों में आम आदमी की कहानी चित्रित की है और उनकी फिल्में समाज के हर वर्ग को पसंद आती है. कपूर परिवार में होली का पर्व बहुत धूम धाम से मनाया जाता है और बड़ी फ़िल्मी हस्तियां उसमे सम्मिलित होती थी. और एक दुसरे को होली की बधाई देते थे एवं गाने गाते थे. राज कपूर संगीत की महान भावना थी और उनकी फिल्मों का संगीत केवल भारत में ही नहीं बल्कि रूस जैसे देशों में भी बहुत लोकप्रिय था। फिल्म इतिहासकार राज कपूर को “भारतीय चार्ली चैपलिन” के रूप में चित्रित करते है. क्योकि उन्होंने फिल्मो में अक्सर ऐसी भूमिकाये निभाई जो एक आवारा, जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, अभी भी हंसमुख और ईमानदार है ।
1970 में अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के जबर्दस्त फ्लॉप होने के बाद, राज कपूर ने अपनी फिल्मों को वासना की ओर एक मोड़ दे दिया .
1973 में राज कपूर ने ‘बॉबी’ फिल्म बनायीं जिससे भारतीय सिनेमा में किशोर रोमांस की प्रवृत्ति शुरू कर दी गयी. उन्होंने बॉबी में ‘डिंपल कपाड़िया’ को हेरोइन लांच किया जो बाद में एक स्टार बन गयी. इस फिल्म में डिंपल कपाड़िया को बिकनी में दिखाया जो उस समय के समाज के हिसाब से एक बोल्ड सीन था.
उन्होंने आगे सत्यम शिवम सुंदरम (1978) और राम तेरी गंगा मैली (1985) की तरह अपने अन्य फिल्मों में कामुकता की सीमाओं को और पीछे कर दिया। राज कपूर की फिल्म सामाजिक संदेश भी ले कर आई. उदाहरण के लिए, उनकी फिल्म प्रेमरोग Premrog (1982) में विधवा पुनर्विवाह की वकालत की गयी । 
सिनेमा के लिए राज कपूर ने अपार योगदान किया और उनकी इन उपलब्धियों के लिए उन्हें कई बार सम्मानित किया गया था। हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए दो राष्ट्रीय पुरस्कार और 11 फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने के साथ साथ कई और भी अवार्ड जीते.
    भारत सरकार द्वारा 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के राज कपूर 1987 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया.उनके सम्मान में, उनकी फोटो का एक डाक टिकट 2001 में भारतीय डाक सेवा के द्वारा जारी किया गया था।
# राज साहब के कुछ यादें हमारे संग्रह से ...

शैलेन्द्र

आज शैलेंद्र जी की पुण्यतिथि (14 दिसंबर 1966) पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आप सब के लिए उनकी बेटी अमला शैलेंद्र से प्रदीप कुमार जी की खास बातचीत ~

"आवारा हूँ, आवारा हूँ ...गर्दिश में हूँ, आसमान का तारा हूँ ...' की लोकप्रियता के बारे में अमला शैलेंद्र बताती हैं, “हम दुबई में रहते थे। हमारे पड़ोस में तुर्कमेनिस्तान का एक परिवार रहता था। उनके पिता एक दिन हमारे घर आ गए, कहने लगे योर डैड रोट दिस सांग आवारा हूँ ... आवारा हूँ ...और उसे रूसी भाषा में गाने लगे।"

इस गाने की कामयाबी का एक और दिलचस्प उदाहरण अमला बताती हैं। “नोबल पुरस्कार से सम्मानित रूसी साहित्यकार अलेक्जेंडर सोल्ज़ेनित्सिन की एक किताब है 'द कैंसर वार्ड'।इस पुस्तक में कैंसर वार्ड का एक दृश्य आता है, जिसमें एक नर्स एक कैंसर मरीज़ की तकलीफ़ इस गाने को गाकर कम करने की कोशिश करती है।"

हालांकि इस गीत के लिए पहले-पहले राजकपूर ने मना कर दिया था। शैलेंद्र ने अपने बारे में धर्मयुग के 16 मई, 1965 के अंक में - 'मैं, मेरा कवि और मेरे गीत' शीर्षक से लिखे आलेख में बताया - “आवारा की कहानी सुने बिना, केवल नाम से प्रेरित होकर मैंने ये गीत लिखा था। मैंने जब सुनाया तो राजकपूर साहब ने गीत को अस्वीकार कर दिया। फ़िल्म पूरी बन गई तो उन्होंने मुझे फिर से गीत सुनाने को कहा और इसके बाद अब्बास साहब को गीत सुनाया। अब्बास साहब की राय हुई कि यह तो फ़िल्म का मुख्य गीत होना चाहिए।"

शैलेंद्र अपने जीवन के अनुभवों को ही कागज़ पर उतारते रहे। इस दौरान उन्होंने सिनेमाई मीटर की धुनों का भी ख़्याल रखा और आम लोगों के दर्द का भी। एक बार राजकपूर की टीम के संगीतकार शंकर-जयकिशन से उनका किसी बात पर मनमुटाव हो गया।

इस वाक़ये के बारे में अमला शैलेंद्र बताती हैं, “कुछ अनबन हो गई थी और फिर शंकर-जयकिशन ने किसी दूसरे गीतकार को अनुबंधित भी कर लिया था। बाबा ने उन्हें एक नोट भेजा - 'छोटी सी ये दुनिया, पहचाने रास्ते, तुम कभी तो मिलोगे, कहीं तो मिलोगे, तो पूछेंगे हाल'. नोट पढ़ते ही अनबन ख़त्म हो गयी और ये नोट गीत में तब्दील हो गया। और आख़िर तक दोनों साथ रहे।"

शैलेंद्र का उनके समकालीन कितना सम्मान करते थे, इसका एक दूसरा उदाहरण 1963 में तब देखने को मिला जब साहिर लुधियानवी ने साल का फ़िल्म फेयर अवार्ड यह कह कर लेने से इंकार कर दिया था कि उनसे बेहतर गाना तो शैलेंद्र का लिखा बंदिनी का गीत - 'मत रो माता लाल तेरे बहुतेरे' है।

शैलेंद्र ने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी पर जब 'तीसरी कसम' फ़िल्म का निर्माण शुरू किया था, तब उनकी आर्थिक मुश्किलों का दौर शुरू हुआ। फ़िल्मी कारोबार से उनका वास्ता पहली बार पड़ा था, वे क़र्ज़ में डूब गए और फ़िल्म की नाकामी ने उन्हें बुरी तोड़ दिया। ये भी कहा जाता है कि इस फ़िल्म की नाकामी के चलते ही उनकी मृत्यु हो हुई। लेकिन अमला शैलेंद्र इससे इनकार करती हैं। अमला बताती हैं, “ये ठीक बात है कि फ़िल्म बनाने के दौरान काफ़ी पैसे लग गए थे। घर में पैसों की दिक्कत हो गई थी। लेकिन बाबा अपने जीवन में पैसों की परवाह कभी नहीं करते थे। उन्हें इस बात का फ़र्क़ नहीं पड़ा था कि फ़िल्म नाकाम हो गई क्योंकि उस वक़्त में वे सिनेमा में सबसे ज़्यादा पैसा पाने वाले लेखक थे। जो लोग सोचते हैं कि फ़िल्म के फ़्लाप होने और पैसों के नुक़सान के चलते शैलेंद्र की मौत हुई, वे ग़लत सोचते हैं।"

अमला यह ज़रूर बताती हैं कि इस फ़िल्म को बनाने के दौरान उनके मन को ठेस पहुंची थी। वे कहती हैं, “उन्हें धोखा देने वाले लोगों से चोट पहुंची थी, बाबा भावुक इंसान थे। इस फ़िल्म को बनाने के दौरान उन्हें कई लोगों से धोखा मिला। इसमें हमारे नज़दीकी रिश्तेदार और उनके दोस्त तक शामिल थे। जान पहचान के दायरे में कोई बचा ही नहीं था जिसने बाबा को लूटा नहीं। नाम गिनवाना शुरू करूंगी तो सबके नाम लेने पड़ जाएंगे।"

ये बात दूसरी है कि 'तीसरी कसम' को बाद में कल्ट फ़िल्म माना गया। इस बेहतरीन निर्माण के लिए उन्हें राष्ट्रपति स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। मशहूर निर्देशक ख़्वाजा अहमद अब्बास ने इसे सैलूलाइड पर लिखी कविता बताया था।

ज़्यादा शराब पीने के कारण लिवर सिरोसिस से शैलेंद्र का निधन 14 दिसंबर, 1966 को हुआ था। महज़ 43 साल की उम्र में वो इस दुनिया को छोड़ गए.

ये भी दिलचस्प संयोग है कि शैलेंद्र का निधन उसी दिन हुआ जिस दिन राजकपूर का जन्मदिन मनाया जाता है। राजकपूर ने अपने दोस्त के निधन के बाद कहा था, “मेरे दोस्त ने जाने के लिए कौन सा दिन चुना, किसी का जन्म, किसी का मरण। कवि था ना, इस बात को ख़ूब समझता था।"

शैलेंद्र तो चले गए लेकिन भारतीय फ़िल्मों को दे गए करीब 800 गीत, जो हमेशा उनकी याद दिलाने के लिए मौजूद रहेंगे।

प्रदीप कुमार
बीबीसी संवाददाता

Monday, December 13, 2021

खोया खोया चांद

शैलेंद्र // एसडी बर्मन // खोया खोया चाँद खुला आसमां

एक दिन शैलेंद्र एसडी बर्मन से मिलने पहुंचे. बर्मन ने उन्हें बताया कि गाने की एक धुन तैयार हुई है और वो उस पर गाना लिख दें. शैलेंद्र ने कहा कि, वो जल्दी ही गाना लिखेंगे. कई दिन गुजरते गए लेकिन शैलेंद्र ने गाना नहीं लिखा बर्मन दा नाराज हो गए और उन्हें लगा कि शैलेन्द्र घमंडी हो गए हैं अब वो खुद शैलेंद्र से कुछ कहना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने अपने बेटे आरडी बर्मन (पंचम दा) से कहा कि वो किसी तरह शैलेंद्र से गाना लिखवाकर लाए..

इसी सिलसले में एक दिन शैलेंद्र और पंचम दा बैठे हुए थे बातचीत के दौरान जब पंचम ने गाने का जिक्र किया तो शैलेन्द्र बोले, गाना तो मैं लिख दूं, मगर ख्याल उस तरह आ नहीं रहा है जिस तरह मैं चाहता हूं , इस पर पंचम ने शैलेंद्र को बताया कि पिता आपसे नाराज हैं. शैलेंद्र ने बात को नजरअंदाज किया और आसमां को ताकते हुए अपने में ही खोये रहे.. कुछ देर यूं ही बैठे बैठे वह कुछ बुदबुदाने लगे.

पंचम की तरफ देखकर शैलेंद्र बोले, ''पंचम तुम इस माचिस की डिबिया पर, गाने की धुन की थाप देते जाओ..

 पंचम डिबिया पर थाप देने लगे इसके बाद शैलेंद्र ने अपनी डायरी निकाली और गीत लिखना शुरू किया  " खोया खोया चांद, खुला आसमां, आंखों में सारी रात जाएगी, तुमको भी कैसे नींद आएगी.'' 

ऐसे ही अगले चंद मिनटों में शैलेंद्र ने गाने के चार अंतरे लिखकर तैयार कर दिए, एसडी बर्मन को यह गाना बहुत पसंद आया,बॉक्स ऑफिस पर फिल्म सुपरहिट साबित हुई और गाने-म्यूजिक को भी जबरदस्त पसंद किया गया.

खोया-खोया चांद, खुला आसमां
आँखों में सारी रात जाएगी
तुमको भी कैसे नींद आएगी, हो
खोया-खोया ...

मस्ती भरी, हवा जो चली
खिल-खिल गई, ये दिल की कली
मन की गली में है खलबली
कि उनको तो बुलाओ, ओ हो ...
खोया-खोया चांद ...

तारे चले, नज़ारे चले
संग-संग मेरे वो सारे चले
चारों तरफ़ इशारे चले
किसी के तो हो जाओ, ओ हो ...
खोया-खोया चांद ...

ऐसी ही रात, भीगी सी रात
हाथों में हाथ, होते वो साथ
कह लेते उनसे दिल की ये बात
अब तो ना सताओ, ओ हो ...
खोया-खोया चांद ...

हम मिट चले, जिनके लिये
बिन कुछ कहे, वो चुप-चुप रहे
कोई ज़रा ये उनसे कहे
न ऐसे आजमाओ, ओ हो ...

खोया-खोया चांद ...गीतकार : शैलेन्द्र, गायक : मोहम्मद रफी, संगीतकार : सचिन देव बर्मन, चित्रपट : काला बाजार (1960) 

Kaala Baazar (1960)

 #MdRafi #goldenerasongs #भूलेबिसरेगीत #भूलेबिसरेनगमे

हमलोग

“हम लोग (1984)”

                                  1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री, स्व० श्रीमती इंदिरा गांधी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण के प्रसारण से टेलीविज़न पर रंगीन (कलर) प्रस्तुति का दौर शुरू हो चुका था। उसी साल एशियन गेम्स का आयोजन भी दिल्ली में ही किया गया था और दूरदर्शन ने इसे प्रसारित भी किया।  टेलीविज़न के प्रति उत्साह जाग रहा था लोगों में और अगले ही साल, यानि 1983 में, कपिल देव के नेतृत्व में भारत ने क्रिकेट का विश्व कप जीत लिया। यह एक आशातीत सफलता थी और हर वर्ग के लोगों में, विशेषकर युवाओं में, कई वर्षों बाद, अपने देश के प्रति, गर्व की भावना जगी। अब हर घर में क्रिकेट के प्रति उत्साह था और क्रिकेट देखने की चाहत। विश्व कप विजय ने बहुत से घरों में टेलीविज़न पहुंचा दिया था और दूरदर्शन भी हर रोज़ नए आयाम जोड़ रहा था अपने साथ।

1982 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तत्कालीन मंत्री, स्व० वसंत साठे मेक्सिको दौरे पर गए थे और वहाँ उन्होंने उस समय मेक्सिको के टेलीविज़न पर दिखाए जाने वाले धारावाहिक, ” वेन कॉमिंगो” के बारे में जाना और जब वे भारत लौटे, तो दो साल अथक परिश्रम करना पड़ा, कलाकारों को, और दर्शकों को 1984 में एक उपहार मिला, जिसका नाम था, “हम लोग”।

“हम लोग”, 7 जुलाई, 1984 को पहली बार दूरदर्शन पर दिखाई गई और यह भारत का पहला प्रायोजित धारावाहिक था जिसे सोप ओपेरा कह सकते थे।
सोप ओपेरा का चलन पहले रेडियो से शुरू हुआ था और पूरी दुनिया में सबसे पहले ये अमरीका के शिकागो में प्रसारित किया गया था। शिकागो के WGN रेडियो स्टेशन से 1930 में, “पेंटेड ड्रीम्स” नाम का धारावाहिक प्रसारित किया गया था, जिसे दुनिया का पहला सोप ओपेरा कहा जा सकता है। सोप ओपेरा इसलिए कहा जाता था, इन धारावाहिकों को क्योंकि इनकी प्रायोजक, साबुन की बड़ी कंपनियां हुआ करती थीं।

भारत आते-आते इस विधा को समय तो लगा, लेकिन टेलीविज़न पर प्रसारित करने के लिए जब “हम लोग” बनाने की बात आई, तो इसके दो लक्ष्य थे, पहला, लोगों को छोटे परिवार रखने के लिए प्रेरित करना और दूसरा मनोरंजन। धारावाहिक को शिक्षा और मनोरंजन दोनों देना था। धीरे-धीरे, ये इतना लोकप्रिय हो गया कि इसे घर-घर में सराहा गया।
“हम लोग”, मनोहर श्याम जोशी जी ने लिखी थी और इसका निर्देशन, पी० कुमार वासुदेव ने किया था। धारावाहिक का शीर्षक गीत, अनिल बिस्वास ने दिया था।

इस धारावाहिक के सभी पात्र, इतने असरदार थे कि आज तक दर्शकों की स्मृतियों में जीवित हैं। बसेसर, लल्लू, नन्हे, बड़की, मंझली, छुटकी, सब अपने ही घर के लोग लगते थे। 154 एपिसोड के प्रसारण के बाद, 17 दिसम्बर, 1985 को इस धारावाहिक का अंतिम भाग दिखाया गया। इस धारावाहिक में विनोद नागपाल, राजेश पुरी, मनोज पाहवा, सीमा पाहवा, जयश्री अरोड़ा, अभिनव चतुर्वेदी, सुषमा सेठ, आसिफ़ शेख़ समेत कई दिग्गज अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने काम किया।

“हर एपिसोड के अंत में महान अभिनेता, अशोक कुमार भी आते थे और सीधे दर्शकों से बातें करते थे। यह धारावाहिक 25 मिनट तक चलता था। अंतिम भाग ज़्यादा देर तक चला था। इस धारावाहिक की लोकप्रियता इतनी ज़्यादा थी कि, अशोक कुमार को चार लाख युवाओं ने इस निवेदन के साथ पत्र लिखा था कि वे उनके माता-पिता को समझाएं उन्हें अपने मन से विवाह करने देने के लिए। “

इस धारावाहिक की शूटिंग, गुरुग्राम (गुड़गांव) में हुआ करती थी और सभी कलाकार, मंडी हाऊस, दिल्ली से रोज़ गुड़गांव, एक वैन में बैठ कर जाते थे। “हम लोग” ने लोगों को टेलीविज़न के सामने बैठे हुए ख़यालों में तैरना सिखा दिया था। दर्शकों की मांग पर, इसे 1993 में, पुनः दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। दुर्भाग्य की बात है कि जिस धारावाहिक को देश के पहले सोप ओपेरा होने का गौरव प्राप्त है, उसकी रिकार्डिंग के रख- रखाव के बारे में, दूरदर्शन के लोगों और कर्मचारियों तक को नहीं पता। यूट्यूब पर भी बस इस धारावाहिक का पहला एपिसोड ही है।

“हम लोग”, दूरदर्शन के आर्काइव्स से ग़ायब हो सकता है लेकिन, लोगों के मन में ये हमेशा रहेगा। “हम लोग” ने पूरे परिवार को एक साथ बैठ कर कहानियों में डूबना उतरना सिखा दिया था और आने वाले समय में दूरदर्शन, बच्चों और बड़ों को एक साथ समय बिताने के बेहतरीन मौक़े देने के लिए तैयार हो चुका था......

रविन्द्र जैन जी

""रवींद्र जैन""
              मैं ईश्वर का शुक्रगुज़ार हूं, उसने मेरी आंखों की बजाय मेरा दिमाग रौशन किया है.
 
...................... जन्म से दृष्टिहीन. लेकिन वो क्या था जिससे वो ‘अति बिचित्र हरिकी छबी’ देख लेते थे..?

""ऊंचे महल के झरोखे से तुम, अंबर की शोभा निहारो ज़रा
रंगों से रंगों का ये मेल जो, आंखों से मन मे उतारो ज़रा
सुनयना, दूर आसमानों को तुम देखो, और मैं तुम्हें देखते हुए देखूं
मैं बस तुम्हें देखते हुए देखूं""
                                      ......."रवींद्र जैन"

सोचिए वो कौन सी दृष्टि थी, जिससे सूरदास या रवींद्र जैन, न सिर्फ इतनी खूबसूरत चीज़ें देख लेते थे, बल्कि उन्हें अपने गीतों, अपनी धुनों में सजा भी लेते थे? ऐसे कि उनके गीतों को पढ़ने वाले, उनकी धुनों को सुनने वाले भी ये सब जस का तस देख पाते थे. महसूस कर पाते थे.
रवींद्र जैन. 28 फरवरी, 1944 को अलीगढ़ में जन्मे. आंखें यूं बंद थीं कि चीरा लगाना पड़ा. आंखें तो दिखने लग गईं लेकिन आंखों से कुछ न दिखा. डॉक्टर बोले कि शायद बाद में दिखाई दे. उम्मीद है...

पिता एक जैन पंडित थे. पण्डित इन्द्रमणि जैन. वैद्य थे. रवींद्र को एक छोटा हारमोनियम खरीद कर दिया. रवींद्र को अपने साथ मंदिर लेकर जाते. रवींद्र पहले तो ये भजन सीखते, फिर धीरे-धीरे गाने भी लगे. इन्द्रमणि एक रुपया देते. उस वक्त के हिसाब से बहुत बड़ी धनराशि.
जहां तक पढ़ाई की बात थी, उनके भाई डॉक्टर डीके जैन इनको कविता से लेकर साहित्य, इतिहास, धार्मिक ग्रन्थ सब पढ़कर सुनाते थे.

दरअसल रवींद्र जैन बचपन से ही रवींद्र संगीत सीखना चाहते थे. इसलिए अपने चाचा के साथ कलकत्ता (अब कोलकाता) आ गए. जेब में पिताजी ने 75 रुपए रख दिए थे. कलकत्ता में एक दशक पूरा गुज़ारा. वहां पहले सीखा फिर एक निर्माता, राधेश्याम झुनझुनवाला ने इन्हें म्यूज़िक सिखाने का ट्यूशन लगवा दिया. एक जगह की पहचान से दूसरी जगह पहचान हुई और ये लिंक्स बंगाल से होते-होते मुंबई तक पहुंच गए.
इस तरह छोटे-मोटे जॉब, इक्का दुक्का पंजाबी, हिंदी गीतों के रास्ते होते हुए ‘सौदागर’ तक पहुंच गए.रवींद जैन के संगीत निर्देशन में जो पहली फिल्म रिलीज हुई वो थी 'कांच और हीरा' (1972)
                ‘सौदागर’, राजश्री प्रोडक्शन की मूवी. वही राजश्री, जिसने ‘हम आपके हैं कौन’ बनाई. सूरज बड़जात्या वाला राजश्री. ‘सौदागर’ का गीत, ‘सजना है मुझे, सजना के लिए’ खूब हिट रहा. जितना तब रहा, उतना ही इसका रिमिक्स हिट हुआ. लेकिन 1973 में फिल्म चली नहीं. इससे डेब्यू करने वाले एक्टर अमिताभ बच्चन और म्यूज़िक डायरेक्टर रवींद्र जैन को हालांकि बुलंदियों का नया आकाश छूना था.
‘सौदागर’ के बाद रवींद्र राजश्री कैंप का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए.  ‘चितचोर’, ‘गीत गाता चल’, ‘अंखियों के झरोंखे से’ जैसी फिल्मों के गीत सुनिएगा, कुछ और सुनने का मन न करेगा देर तक. ये सारे राजश्री और रवींद्र जैन के गठबंधन के सबूत हैं. संगीत और लिरिक्स से लेकर कई गीतों में तो आपको आवाज़ भी रवींद्र जैन की सुनने को मिल जाएगी.
येसुदास और हेमलता की आवाज़ अगर कहीं सुनने को मिल जाए तो आप ‘ब्लाइंड गेस’ कर सकते हैं कि म्यूज़िक और लिरिक्स रवींद्र जैन की होगे. और आप ज़्यादतर सही ही निकलेंगे. राजश्री के साथ जहां उनका बड़े परदे के लिए कोलैबरेशन यादगार रहा, वहीं छोटे पर्दे के लिए उन्होंने सागर आर्ट्स के साथ मिलकर धूम मचाई. ‘रामायण’, ‘श्री कृष्ण’, ‘अलिफ़ लैला’. अपने समय में इन धारावाहिकों ने ही नहीं, इनके गीतों ने भी अपार सफलता पाई.
रामचरितमानस की एक चौपाई है, होइही वही जो राम रचि राखा.. धारावाहिक रामायण के लिए ये चौपाई रवींद्र जैनजी के जीवन में चरितार्थ हो गई, दरअसल पहले इस धारावाहिक में संगीत निर्देशन का काम स्वर्गीय "जयदेव" जी कर रहे थे, लेकिन अचानक हुई उनकी मृत्यु की वजह से रवींद्रजी को रामायण के संगीत की ज़िम्मेदारी मिली, और उन्होंने उतनी ही बखूबी इस ज़िम्मेदारी को निभाया.रामानदं सागर की रामायण से सबसे पहले उन्होंने अपने टीवी करियर की शुरुवात की जिसमे उन्हों संगीत भी दिया और रामायण का शीर्षक गीत और चौपाइया भी गाई ।आज भी आपको उनकी चौपाई                   
                  “मंगल भवन अमंगल हारी ” 
याद होगी जिसे हम उन्ही के संगीत और स्वरों में आज गाते है। बचपन से ही भजनों का शोक रखने वाले रविन्द्र जैन ने पुरे दिल से रामायण के लिए संगीत दिया।

अच्छा चलिए, अब ऐसा करते हैं, इनके बारे में बाकी बातें चार किस्सों से जानते हैं.....

# 1) रवींद्र जैन की लव स्टोरी-

सौदागर की रिलीज़ पर रवींद्र जैन एक कविता सुना रहे थे-

ये कविता दर्शकों के बीच बैठी एक लड़की को बहुत पसंद आई. लड़की का नाम 'दिव्या' 'जो स्वम एक कवित्री थी' लड़की की मां ने कविता सुनने के बाद घर पहुंचकर तारीफ़ में कहा-

अगर मेरी लड़की बड़ी होती तो मैं उसकी इनसे शादी कर देती.

दिव्या दौड़कर दूसरे कमरे में गई और साड़ी पहनकर वापस आई. अपनी मां से कहा-

मम्मी,क्या  मैं बड़ी नहीं लगती?

मां, दिव्या के मन की बात समझ गई थीं. एक इंटरव्यू में रवींद्र जैन ने बताया कि दिव्या मेरी आंखों की रौशनी है.

# 2) जब अनचाही मिली भीख खर्च करने का टास्क मिल गया-

ये तो हमें पता ही है कि रवींद्र जैन बचपन में भजन गाते थे. और ये भजन वो सिर्फ मंदिरों में ही नहीं, अपने दोस्तों के साथ शहर में घूमते-फिरते भी गाते थे. ये उनके और उनके दोस्तों के लिए एक खेल सरीखा था. तो ऐसे ही एक दिन भजन गाते-गाते ये मंडली अलीगढ़ रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई. वहां बैठकर गा रहे थे, तो लोगों के इनको पैसे देने शुरू कर दिए. इस चीज़ की इन्हें उम्मीद नहीं थी, और न ही ये पता था कि इस तरह से पैसे मिलना कितना ग़लत समझा जा सकता है. ये ख़ुशी-ख़ुशी पापा के पास गए और पूरी बात बता दी.
इनके पिता पण्डित इन्द्रमणि जैन ने वही किया जो ऐसी स्थिति में ज़्यादातर पिता करते हैं. कुटाई.
और साथ में ये भी कहा कि ये पैसे जिनके हैं उनको वापस कर आओ.
लो मज़ा! अब जिन लोगों ने पैसे दिए, कहां से खोजें उन्हें? भूस के ढेर में राई का दाना…
तो जो किया नहीं जा सकता, वो किया नहीं गया. मतलब बंदे ढूंढें नहीं गए. और जो किया जा सकता था, वो कर लिया गया. मतलब चाट-पकौड़े आदि के यज्ञ में इस धन की आहुति दे दी गई।

# 3.1) जब एक मज़ेदार के कन्फ्यूज़न के चलते एक रवींद्र को भूखा रहना पड़ा-

अपने बंगाल प्रवास के दौरान, ट्यूशन वगैरह तो देते ही थे. आवाज़ भी अच्छी ही थी. भजन वगैरह की प्रेक्टिस थी. तो कोलकाता में हिट होने लगे. एक दिन एक भद्रजन ने घर पर आने और भोजन का निमंत्रण दे दिया. रवींद्र जैन गए. मन में हलुवा पूड़ी की उम्मीद लिए. काफी देर तक गीत संगीत का दौर चला. भोजन बहरहाल नदारद था. आखिर अंत में पूछ ही डाला-

अब भोजन कर लिया जाए?

पता चला कि आमंत्रण ‘भजन’ का था. जो कहने वाले के बंगाली एक्सेंट के चलते ‘भोजोन’ और सुनने वाली की उम्मीद के चलते ‘भोजन’ हो गया था.

# 3.2) जब राजकपूर के प्रेम के चलते एक बार फिर भूखा रहना पड़ा-

राजकपूर, रवींद्र जैन के लिए काफी केयरिंग एटीट्यूड रखते थे. पूना में राजकपूर का फार्म हाउस था. उस दिन वो वहीं ठहरे थे. रवींद्र जैन को कॉल लगाकर भोजन का आमंत्रण दिया. हालांकि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है, लेकिन फिर भी अबकी बार ‘गुगली’ होने की उम्मीद कम थी. उसके बाद जैसा रवींद्र जैन ने दूरदर्शन को दिए एक इंटरव्यू में बताया-

”देखा जाकर कि राजकपूर बैंगन का भर्ता बनाने में लगे हुए हैं. मार उसमें घी और मसाला. उन्होंने कहा कि तुमको खाना है ये. इतना बड़ा बैंगन, और हम लोगों की ट्रेजेडी ये है कि हम जैन, प्याज़ नहीं खाते. बैंगन हमारे यहां नहीं खाते. उन्होंने कसम देदी कि मेरे मरे पे, अगर तुम ये न खाओ तो. अब सा’ब जैसे ही मौका लगा मैंने वो ओमप्रकाश को दे दिया. किसी तरह मैनेज किया.”

# 4) मगर राजकपूर और रवींद्र जैन मिले कैसे-

राजकपूर की मुलाकात रवींद्र जैन से एक गीत संगीत के प्रोग्राम में हुई. रवींद्र जैन के परफॉरमेंस के दौरान राजकपूर उनकी पत्नी दिव्या को सवा रुपए देते हुए बोले-

ये गीत किसी को नहीं दिया है तो मेरा.

फिर शायद राजकपूर ये बात, ये प्रॉमिस भूल गए. मगर उन्हें रवींद्र जैन याद रहे. घर आना-जाना शुरू हो गया. इस वाकये के कुछ महीनों बाद रवींद्र, राजकपूर के घर में बैठे थे. बातों-बातों में राजकपूर थोड़ा टेंस हो गए. बोले-

 ” ‘राम तेरी गंगा मैली’ नाम की मूवी बना रहा हूं. दिक्कत ये है कि मैंने ही ‘जिस देश में गंगा बहती है’ बनाई है. मैं ही ‘राम तेरी गंगा मैली’ बना रहा हूं, लोग क्या सोचेंगे?”

रवींद्र जैन ने हारमोनियम उठाया और न जाने दिमाग में क्या आया, उन्होंने उसी वक्त एक लाइन दे दी-

राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते.

इसके बाद राजकपूर ने कहा-

” बस! अब मैं अपनी फिल्म का टाइटल जस्टिफाई कर सकता हूं.”

इस एक लाइन के चलते रवींद्र जैन, ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए साइन कर लिए गए.
तो दोस्तों ये थे रवींद्र जैन के चार मज़ेदार किस्से. और इनसे पता चलता है कि वो कितने जीवंत थे. 09 अक्टूबर, 2015 को उनकी मृत्यु हो गई. उनकी पत्नी दिव्या ने बताया कि उनके अंगों ने एक-एक कर काम करना बंद कर दिया था.

मशहूर एंकर-प्रेज़ेंटर तबस्सुम ने उनकी शोक सभा में रोते हुए बताया –

”अक्सर वो कहा करते थे, ‘आदमी के साथ, उसका खत्म किस्सा हो गया. आग ठंडी हो गई, चर्चा भी ठंडा हो गया.’ लेकिन जहां तक हमारे दद्दू (रवींद्र जैन) का ताल्लुक है, उनका चर्चा कभी खत्म नहीं होगा. जब तक ये दुनिया रहेगी. जब तक उनके गीत रहेंगे. उनका संगीत रहेगा. उनकी आवाज़ हमारे कानों में गूंजती रहेगी. उनकी याद उनके चाहने वालों के दिलों में हमेशा अमर रहेगी.”